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Indian Bhabhi Sex Stories – Desi Hot Bhabhi Stories in Hindi
Indian Bhabhi Sex Stories – Desi Hot Bhabhi Stories in Hindi

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Indian Bhabhi Sex Stories – Desi Hot Bhabhi Stories in Hindi

Indian Bhabhi Sex

सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया

Desi Bhabhi Chudai, August 16, 2026September 21, 2026

जब रोटी का सवाल आया

मार्च की भीषण गर्मी में भी सुनीता के कमरे की खिड़की से आती हवा ठंडी लग रही थी। वो खिड़की के पास खड़ी होकर बाहर देख रही थी, जहाँ गली में बच्चे खेल रहे थे और औरतें आपस में बातें कर रही थीं। उनकी उम्र 47 साल हो चुकी थी, लेकिन आज वो 70 की लग रही थी। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

उसके हाथ में एक चिट्ठी थी — किराए का नोटिस। तीन महीने का बकाया। 15,000 रुपये। मालिक ने आखिरी बार चेतावनी दी थी — अगले हफ्ते तक पैसे नहीं दिए तो घर खाली करना होगा।

सुनीता का हाथ कांप रहा था। उसके पति की मौत को दो साल हो चुके थे। फैक्टरी में हुए हादसे में वो चले गए और मुआवजे के नाम पर सिर्फ 50,000 रुपये मिले थे, जो बेटी की शादी और बेटे की पढ़ाई में खत्म हो गए। बेटा राहुल कॉलेज में था, लेकिन पिछले महीने ही उसने पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि फीस नहीं दे पा रहे थे। वो अब कहीं मजदूरी करने गया था, लेकिन कहाँ, क्या कर रहा था, इसका पता किसी को नहीं था। दो हफ्ते से उसका कोई फोन नहीं आया था।

“अम्मा, चाय बना दूँ?”

पीछे से आवाज़ आई। बड़ी बेटी प्रिया। 25 साल की, गोरी, लंबे काले बाल, लेकिन आँखों में वो चमक नहीं थी जो पहले हुआ करती थी। उसकी शादी टूट चुकी थी — ससुराल वालों ने दहेज़ के लिए इतना तंग किया कि वो एक साल में ही मायके आ गई। तलाक हो चुका था, लेकिन समाज में वो “तलाकशुदा” की हैसियत से जी रही थी। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

“हाँ बना दे,” सुनीता ने बिना पीछे देखे कहा।

उसकी आँखें अभी भी उस कागज़ पर टिकी थीं। 15,000। वो सोच रही थी कि कहाँ से आएँगे। उसकी नौकरी चली गई थी — सिलाई का काम था, लेकिन फैक्ट्री बंद हो गई। अब वो घरों में काम करने जाती थी, लेकिन महीने में 3-4 हज़ार से ज़्यादा नहीं बन पाते थे।

“अम्मा, यह क्या है?”

प्रिया ने चाय रखते हुए नोटिस देखा। उसने पढ़ा और उसका चेहरा पीला पड़ गया।

“ये… ये कब का है?”

“कल आया है। मालिक आया था। बोला अगले हफ्ते तक पैसे नहीं दिए तो…”

सुनीता की आवाज़ रुक गई। वो रोने लगी। प्रिया ने उसे गले लगाया, लेकिन उसके पास भी कोई जवाब नहीं था।

“राहुल भैया का फोन आया?” प्रिया ने पूछा।

“नहीं। दो हफ्ते हो गए।”

“उसे ढूंढना होगा।”

“कहाँ ढूंढूँ? पता भी नहीं है कहाँ है।”

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और छोटी बेटी अंजलि आई। 21 साल की, कॉलेज में आखिरी साल की छात्रा। उसका चेहरा उतरा हुआ था।

“अम्मा, कॉलेज से फोन आया था। फीस का आखिरी डेट था आज। अगर कल तक 8,000 नहीं दिए तो…”

अंजलि की आवाज़ रुक गई। वो देख रही थी कि उसकी माँ और बहन क्यों रो रहे थे। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

“क्या हुआ?”

प्रिया ने नोटिस उसे दिखाया। अंजलि ने पढ़ा और वो भी रोने लगी।

“अब क्या होगा?”

तीनों औरतें एक-दूसरे को देख रही थीं। चार दीवारों में कैद, बेबस, लाचार।


शाम को सुनीता ने दोनों बेटियों को अपने पास बुलाया। वो बीच वाले कमरे में बैठी थी — घर का सबसे बड़ा कमरा, जहाँ पहले पति के साथ बैठकर बातें किया करती थी। अब वो कमरा खाली और सूना लगता था।

“बैठो,” उसने कहा।

प्रिया और अंजलि बैठ गईं। तीनों के बीच एक अजीब सी खामोशी थी। सुनीता कुछ कहना चाह रही थी, लेकिन शब्द उसके गले में अटक रहे थे।

“अम्मा, कुछ तो बोलो,” प्रिया ने कहा।

सुनीता ने गहरी साँस ली। उसकी आँखें लाल थीं, आँसू सूख चुके थे, लेकिन दर्द बाकी था।

“मैं… मैंने एक रास्ता सोचा है।”

“कौन सा रास्ता?”

सुनीता ने फिर रुककर देखा। उसके हाथ कांप रहे थे।

“पास के बाजार में… वो लड़कियाँ…”

वो कह नहीं पाई। लेकिन प्रिया समझ गई। उसका चेहरा बदल गया।

“अम्मा! तुम… तुम क्या कह रही हो?”

“और कोई रास्ता नहीं है बेटा,” सुनीता रोते हुए बोली। “घर जाएगा, तुम्हारी पढ़ाई रुक जाएगी, समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे। राहुल कहाँ है पता नहीं। अगर वो लौट भी आए तो कहाँ रहेंगे?”

“लेकिन ये… ये कैसे…”

प्रिया उठ खड़ी हुई। उसके चेहरे पर गुस्सा था, लेकिन आँखों में डर भी।

“मैंने सोच लिया है,” सुनीता ने कहा। “मैं अकेली… मैं अकेली करूँगी। तुम दोनों को इसमें नहीं लाना चाहती।”

“नहीं!” अंजलि चीखी। वो उठी और कमरे में चक्कर लगाने लगी। “नहीं अम्मा! ये गलत है! हम ऐसा नहीं कर सकते!”

“तो और क्या करूँ बेटा?” सुनीता ने चीखकर कहा। “बता! क्या करूँ? किसी के आगे हाथ फैलाऊँ? कर्ज़ लूँ? कौन देगा? तुम्हारे चाचा ने मना कर दिया। मामा ने फोन नहीं उठाया। हमारे अपने ही…”

वो फूट-फूट कर रोने लगी।

“मैंने एक जगह पता किया है,” सुनीता ने रोते हुए कहा। “पास में ही एक होटल है। वहाँ… वहाँ ऐसी लड़कियों की ज़रूरत है। रात का 500, कभी-कभी 1000 भी मिल जाता है। अगर मैं रोज़ एक-दो आदमी…”

“बस करो अम्मा!” अंजलि ने कान पकड़ लिए। “मत कहो ये सब!”

प्रिया खड़ी थी, स्तब्ध। उसके दिमाग में उसके पति का चेहरा आ रहा था, ससुराल वालों की गालियाँ आ रही थीं, समाज की नज़रें याद आ रही थीं। और अब ये…

“मैं करूँगी,” सुनीता ने कहा। “तुम दोनों को इसमें नहीं घसीटूँगी। बस कुछ दिन… जब तक राहुल नहीं आ जाता या कोई और रास्ता नहीं निकलता।” ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

रात भर तीनों अपने-अपने कमरों में लेटी रहीं। कोई सो नहीं पाया।


भाग 2: पहली रात

अगले दिन सुनीता ने एक पुरानी साड़ी पहनी जो उस पर कभी अच्छी लगती थी, लेकिन अब उसकी उम्र और थकान उस पर साफ झलक रही थी। उसने थोड़ा सिंदूर लगाया, बालों में कंघी की, और आईने में देखा।

वो खुद से नफरत करने लगी।

“माँ बनने के लिए ये क्या कर रही हूँ मैं,” उसने खुद से कहा। लेकिन फिर किराए का नोटिस याद आया, अंजलि की फीस याद आई, और वो दरवाज़े की ओर बढ़ी।

“अम्मा, मैं भी चलूँगी,” प्रिया ने पीछे से आवाज़ दी।

सुनीता मुड़ी। प्रिया तैयार खड़ी थी — साड़ी पहने हुए, चेहरे पर कोई मेकअप नहीं, लेकिन आँखों में वो जिद्द थी जो एक बहन की होती है।

“नहीं बेटा, तुम नहीं…”

“मैं चलूँगी,” प्रिया ने दोहराया। “अकेले नहीं जाने दूँगी। अगर ये करना ही है तो… तो हम साथ में करेंगे।”

“नहीं दीदी!” अंजलि दौड़कर आई। उसका चेहरा आँसुओं से भीगा था। “तुम दोनों पागल हो गए हो! ये… ये काम है! ये गलत है!”

“तो और क्या करें अंजलि?” प्रिया ने गुस्से में कहा। “घर जाएगा, तुम्हारी पढ़ाई रुक जाएगी, अम्मा सड़क पर आ जाएगी। क्या तुम ये देखना चाहती हो?”

“लेकिन ये…”

“तुम घर पर रहो,” सुनीता ने कहा। “तुम्हें इसमें नहीं लाना चाहती। तुम्हारी उम्र… तुम्हारी पढ़ाई…”

“मैं नहीं रहूँगी!” अंजलि चीखी। “अगर तुम दोनों गईं तो मैं भी चलूँगी! या फिर… या फिर मैं कुछ कर लूँगी!”

वो इतनी ज़ोर से रोने लगी कि पड़ोसियों ने कान लगाए। सुनीता ने उसे चुप कराया।

“ठीक है, ठीक है। तुम भी चलो। लेकिन… लेकिन तुम कुछ नहीं करोगी। बस साथ में रहोगी।”

तीनों औरतें घर से निकलीं। शाम के 6 बज रहे थे। गली में लोग उन्हें देख रहे थे — तीनों साड़ियों में, चेहरे पर कालिख लिए हुए।


वो होटल शहर के पुराने हिस्से में था। चार मंजिला, पीली बत्ती, और एक गंदी सी गली जहाँ से गुज़रने में भी शर्म आती थी। सुनीता ने पता किया था — उसकी एक पुरानी सहपाठी यहाँ काम करती थी। उसने ही रास्ता बताया था। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

तीनों ऊपर की मंजिल पर पहुँचीं। एक आदमी बैठा था — मोटा, तेल लगाए बाल, सोने की चेन। उसने तीनों को देखा और समझ गया।

“नई हो?” उसने पूछा।

“हाँ,” सुनीता ने कहा। उसकी आवाज़ कांप रही थी।

“तीनों?”

“मैं… मैं करूँगी,” सुनीता ने कहा। “ये मेरी बेटियाँ हैं। ये… ये सिर्फ…”

आदमी ने हाथ उठाया। “समझ गया। माँ-बेटी का जुगाड़। अच्छा माल है।”

उसने घिन से भरी नज़रों से तीनों को देखा। सुनीता का दिल काँप उठा, लेकिन वो चुप रही।

“एक रात का 500,” आदमी ने कहा। “मेरा 150 अलग। बाकी तुम्हारा। कमरा ऊपर है। पहला क्लाइंट आधे घंटे में आएगा।”

उसने एक चाबी दी। सुनीता ने हाथ बढ़ाया। उसके हाथ कांप रहे थे।

“अम्मा…” प्रिया ने पीछे से कहा।

“चलो,” सुनीता ने कहा।

कमरा छोटा था, गंदा, एक पुराना बिस्तर, एक टूटी कुर्सी, और एक पंखा जो आवाज़ कर रहा था। खिड़की से बाज़ार की आवाज़ें आ रही थीं।

तीनों खड़ी थीं। कोई कुछ नहीं बोल रहा था।

“तुम दोनों बाहर इंतज़ार करो,” सुनीता ने कहा। “मैं… मैं पहले…”

“अम्मा, मैं अंदर रहूँगी,” प्रिया ने कहा। “अकेले नहीं छोड़ूँगी।”

“लेकिन…”

“मैं कोने में बैठ जाऊँगी। अगर कुछ… अगर कुछ गड़बड़ हुई तो…”

सुनीता ने हामी भरी। अंजलि को वो बाहर बैठना पड़ा — गलियारे में एक स्टूल पर, जहाँ से वो कमरे का दरवाज़ा देख सकती थी।

पहला क्लाइंट आया — 40-45 साल का, शादीशुदा लग रहा था, शर्ट पैंट में। उसने अंजलि को देखा, लेकिन अंदर गया।

सुनीता बैठी थी। उसने साड़ी ठीक की। आदमी ने दरवाज़ा बंद किया और उसे देखा।

“कितने में?” उसने पूछा।

“500,” सुनीता ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी।

आदमी ने पैसे निकाले और बिस्तर पर रखे। फिर उसने अपनी शर्ट उतारी।

सुनीता ने आँखें बंद कर लीं। वो सोच रही थी — अपने पति को, अपनी शादी की पहली रात को, अपने बच्चों को। वो सोच रही थी कि कैसे एक माँ इतनी गिर सकती है।

जब आदमी ने उसे छुआ तो उसका शरीर काँप उठा। वो अपने आप को दूर धकेलना चाहती थी, लेकिन पैसे याद आए। वो खड़ी हुई, साड़ी खोली, और बिस्तर पर लेट गई।

आदमी जल्दबाज़ था। 10-15 मिनट में वो कपड़े पहनकर निकल गया। सुनीता लेटी रही। उसके शरीर में दर्द था, लेकिन दिल में एक अजीब सी खालीपन थी।

प्रिया कोने से उठी। उसने अपनी माँ को देखा — बिखरे बाल, आँसू से भीगा चेहरा, खुली साड़ी। वो रोने लगी।

“अम्मा…”

सुनीता ने उठकर कपड़े ठीक किए। उसने पैसे उठाए — 500। हाथ कांप रहे थे।

“एक और आएगा,” उसने कहा। “तुम… तुम कर लेना इस बार।”

प्रिया ने पीछे हटकर देखा। “मैं… मैं कैसे…”

“करना पड़ेगा बेटा,” सुनीता ने कहा। “अकेले नहीं कर पाऊँगी। और पैसे चाहिए। तुम्हारी बहन की फीस, किराया…”

प्रिया ने गहरी साँस ली। उसने अपनी साड़ी ठीक की और बिस्तर पर बैठ गई।

दूसरा आदमी आया — ये और भी जल्दबाज़ था, और गंदा। उसने प्रिया को देखते ही हाथ लगाया। प्रिया ने काँपते हाथों से अपनी साड़ी खोली।

सुनीता कोने में खड़ी थी, आँखें बंद किए। वो सुन रही थी — अपनी बेटी की सिसकियाँ, आदमी की आवाज़ें, बिस्तर की आवाज़ें।

वो सोच रही थी — क्या यही माँ होना है? क्या यही पालना-पोसना है? अपनी बेटियों को इस कुर्सी पर बैठाकर, इस बिस्तर पर लेटाकर?

जब आदमी निकला तो प्रिया रो रही थी। उसने पैसे उठाए — 500। सुनीता ने उसे गले लगाया। दोनों माँ-बेटी एक-दूसरे में समा कर रो रही थीं।

बाहर अंजलि सुन रही थी। वो रो रही थी, कांप रही थी, लेकिन कुछ नहीं कर सकती थी।

उस रात तीनों औरतें घर लौटीं — 1000 रुपये लेकर। रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। सुनीता सोच रही थी कि कैसे ये पैसे अपने हाथ में रखे हैं। प्रिया सोच रही थी कि उसका शरीर अब किसी और का हो गया है। अंजलि सोच रही थी कि कल क्या होगा। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया

भाग 3: धंधे की आदत

एक हफ्ता बीत गया। हर रात वो तीनों जाते, और हर रात 1000-1500 रुपये लेकर आते। किराया दे दिया गया था। अंजलि की फीस भर दी गई थी। घर में राशन आ गया था।

लेकिन घर का माहौल बदल गया था।

सुनीता दिन में सोती रहती थी। जब जागती तो खाना बनाती, लेकिन बात नहीं करती। प्रिया टीवी देखती रहती थी, लेकिन उसकी आँखें स्क्रीन पर नहीं होतीं। अंजलि कॉलेज जाती, लेकिन पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगता था।

तीनों एक-दूसरे से नज़रें चुराते। जब रात होती और वो तैयार होते, तो कोई किसी से बात नहीं करता। बस चुपचाप निकलते, चुपचाप काम करते, चुपचाप लौटते।

सुनीता के लिए ये आसान नहीं था। उसकी उम्र 47 साल थी, और आदमी उसे देखते ही पहचान जाते थे — ये बुढ़िया है, सस्ते में मिलेगी। कभी-कभी वो 300-400 में ही तैयार हो जाती। उसके शरीर में दर्द रहता था — कमर में, पैरों में, आँखों में। लेकिन वो चुप रहती।

प्रिया थोड़ी “पॉपुलर” हो गई थी। जवान थी, गोरी थी। क्लाइंट्स उसे पसंद करते थे। कभी-कभी वो एक रात में 3-4 आदमियों के साथ जाती। वो गिनती रहती — 500, 500, 500। उसका दिल सूखता जा रहा था, लेकिन वो चेहरे पर मुस्कान रखती। “आइए,” “बैठिए,” “क्या लेंगे” — ये शब्द अब उसकी ज़ुबान पर आ गए थे।

लेकिन रात को जब वो अकेली लेटती, तो रोती। वो सोचती — उसकी शादी क्यों टूटी, उसका पति क्यों छोड़ गया, वो क्यों यहाँ है। कभी-कभी वो सोचती कि मर क्यों नहीं जाती।

अंजलि अभी तक “सेफ” थी। सुनीता और प्रिया ने उसे बचाकर रखा था। वो बस साथ जाती, बाहर इंतज़ार करती, और वापस आती। लेकिन वो देख रही थी — अपनी माँ को टूटते हुए, अपनी बहन को बिकते हुए।

उसकी पढ़ाई पर असर पड़ रहा था। वो क्लास में बैठती और सोचती — क्या पढ़ाई का कोई मतलब है? क्या यही ज़िंदगी है? क्या हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे?


दसवें दिन मालिक ने कहा — “तुम तीनों अच्छा काम कर रही हो। लेकिन यहाँ कमाई कम है। मैं एक जगह बता सकता हूँ — अच्छे लोग आते हैं, ज़्यादा पैसे मिलते हैं। लेकिन वहाँ… वहाँ तीनों को काम करना होगा।”

सुनीता समझ गई। उसने मना किया — “मेरी छोटी बेटी नहीं करेगी।”

“तो फिर यहीं रहो,” मालिक ने कहा। “लेकिन मेरा हिस्सा बढ़ जाएगा। 200 रुपये रोज़।”

सुनीता मजबूर हो गई। उसने सोचा — अंजलि को कैसे बचाएँ? लेकिन वो खुद थक चुकी थी। प्रिया भी थक चुकी थी। दोनों मिलकर एक दिन में 1000-1500 कमा पाते थे, जिसमें से 400 मालिक का, 200 किराया, 300 राशन, 200 अंजलि की फीस। बचता कुछ नहीं था।

उस रात घर आकर सुनीता ने अंजलि से बात की।

“बेटा, तुम्हें भी…”

“नहीं अम्मा,” अंजलि ने पीछे हटते हुए कहा। “मैं नहीं करूँगी।”

“लेकिन मजबूरी है। हम दोनों थक गए हैं। तुम्हारी बहन एक दिन में चार-पाँच आदमियों के साथ जाती है। उसका शरीर…”

“मत कहो!” अंजलि ने कान पकड़ लिए। “मैं नहीं सुनूँगी!”

“तो फिर हम क्या करें?” सुनीता ने चीखकर कहा। “बता! तुम पढ़ती हो, तुम्हें पता होगा! क्या करें?”

अंजलि रोने लगी। वो जानती थी कि कोई रास्ता नहीं था। लेकिन वो खुद को इसके लिए तैयार नहीं कर पा रही थी।

“मैं… मैं पार्ट-टाइम नौकरी ढूंढती हूँ,” उसने कहा।

“कहाँ? कौन देगा? तुम्हारी पढ़ाई पूरी नहीं हुई। हमारा कोई रिश्तेदार मदद को नहीं आता।”

सुनीता ने अंजलि को गले लगाया। “बस कुछ महीने बेटा। जब तक तुम्हारी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती। फिर तुम नौकरी करना, हमें यहाँ से निकालना।”

अंजलि ने कुछ नहीं कहा। वो रोती रही।


अगले दिन अंजलि को भी जाना पड़ा। वो तीनों साथ गईं, लेकिन इस बार अंजलि को भी कमरे में बुलाया गया।

पहला क्लाइंट एक नौजवान था — 25-26 साल का, शायद पहली बार आया था। उसने अंजलि को देखा और शर्मा गया।

“ये… ये तो बहुत छोटी लग रही है,” उसने कहा।

“21 साल की है,” सुनीता ने कहा। उसकी आवाज़ कड़क थी।

लड़के ने 500 दिए और अंजलि के पास बैठा। अंजलि काँप रही थी। उसने आँखें बंद कर लीं। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

“डरो मत,” लड़के ने कहा। “मैं… मैं जल्दी निपटा दूँगा।”

उसने अंजलि को छुआ तो वो काँप उठी। उसका शरीर सख्त हो गया, पत्थर की तरह। वो साँस लेना भूल गई।

जब वो ऊपर आया तो अंजलि की आँखें बंद थीं, आँसू बह रहे थे, लेकिन कोई आवाज़ नहीं थी। वो एक मर हुई लाश की तरह लेटी थी।

लड़का निपटकर निकल गया। अंजलि वैसे ही लेटी रही। सुनीता ने उसे उठाया, कपड़े पहनाए, और गले लगाया।

“माफ़ करना बेटा,” वो रोते हुए बोली। “माफ़ करना।”

अंजलि ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखें खाली थीं। वो सोच रही थी — वो मर गई है। जो अंजलि थी, वो अब नहीं रही।


भाग 4: तीनों की दुनिया

अब तीनों काम करती थीं। सुनीता सुबह के वक्त आती थी — बुजुर्ग आदमी, जो सस्ते में काम चलाते थे। प्रिया दोपहर और शाम — जवान आदमी, जो ज़्यादा पैसे देते थे। अंजलि रात को — कम क्लाइंट्स, क्योंकि वो नई थी और महँगी लगती थी।

तीनों का शेड्यूल बन गया था। सुबह 9 से 12 सुनीता, दोपहर 12 से 5 प्रिया, शाम 5 से 9 फिर सुनीता, और रात 9 से 12 अंजलि। कभी-कभी ओवरटाइम भी होता।

घर में अब थोड़े पैसे आने लगे थे। किराया चल रहा था, अंजलि की फीस भर रही थी, खाने में दो वक्त की रोटी मिल रही थी। लेकिन तीनों के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

सुनीता के शरीर में दर्द बन गया था। उसकी कमर में पुरानी चोट थी, जो अब और बढ़ गई थी। उसके स्तन ढीले पड़ गए थे, पेट निकल आया था। आदमी उसे देखते ही कम पैसे देते। वो अब 300-400 में ही काम करती थी। कभी-कभी 200 में भी।

लेकिन वो गिनती रहती थी। हर रात वो पैसे गिनती — 200, 300, 400, 500। और सोचती — अंजलि की फीस के लिए, प्रिया की दवा के लिए, किराये के लिए।

उसे नींद नहीं आती थी। जब आँखें बंद करती तो वो आदमी याद आते — गंदे, जल्दबाज़, कभी-कभी मारने वाले, कभी-कभी रोने वाले। एक आदमी था जो हर बार आता और रोता — उसकी पत्नी बीमार थी, उसे पैसे चाहिए थे, लेकिन वो यहाँ आता था। सुनीता उसे देखकर और रोती।

प्रिया “प्रोफेशनल” हो गई थी। वो जान गई थी कि कैसे पैसे लेने हैं, कैसे आदमी को जल्दी निपटाना है, कैसे “पसंद” आना है। उसने कुछ रेगुलर क्लाइंट्स बना लिए थे — एक दुकानदार, एक टीचर, एक पुलिसवाला। वो उसे “प्रिया बाई” कहते, और वो उन्हें “साहब”।

लेकिन अंदर से वो खाली थी। वो अपने आप से नफरत करती थी। जब वो आईने में देखती तो उसे वो लड़की नहीं दिखती थी जो कभी थी। वो एक रंडी दिखती थी — मोटी होठों वाली, काली आँखों वाली, सड़ी हुई साँसों वाली।

कभी-कभी वो सोचती कि भाग जाए। कहीं दूर। लेकिन फिर माँ और बहन याद आतीं। वो अकेले नहीं छोड़ सकती थी।

अंजलि सबसे ज़्यादा टूटी हुई थी। उसके लिए हर बार वो पहली बार जैसा ही था। उसका शरीर कभी “आदी” नहीं हुआ। हर आदमी के साथ वो वही काँपती, वही रोती, वही मर जाती।

एक बार एक आदमी ने उसे मारा — ज़ोर से थप्पड़, क्योंकि वो “साथ” नहीं दे रही थी। अंजलि ने कुछ नहीं कहा। वो रोती रही। बाद में प्रिया ने उसे देखा — गाल पर लाल निशान।

“किसी ने मारा?” प्रिया ने पूछा।

अंजलि ने हामी भरी।

“नाम बता, मैं…”

“छोड़ो दीदी,” अंजलि ने कहा। “क्या फर्क पड़ता है।”

वो दोनों एक-दूसरे को देखतीं। दो बहनें, दो रंडियाँ, दो टूटी हुए लोग।


एक महीना बीत गया। फिर दो। तीनों की ज़िंदगी एक लय में चल रही थी — दिन में सोना, शाम को तैयार होना, रात को काम, फिर वापसी, फिर सोना।

घर में अब टीवी था — पुराना, लेकिन चलता था। अंजलि के पास नया मोबाइल था — पढ़ाई के लिए। रसोई में नया गैस सिलेंडर था। लेकिन ये सब कमरे में बंद थे, जैसे तीनों की ज़िंदगी।

सुनीता ने एक बार सोचा — क्या राहुल वापस आएगा तो क्या कहेगी? क्या कहेगी कि माँ क्या कर रही है? क्या कहेगी कि बहनें कहाँ जाती हैं रात को?

वो सोचकर रोती। लेकिन फिर पैसे याद आते और वो चुप हो जाती।

प्रिया ने एक बार सोचा — क्या अगर उसका पति वापस आया तो? क्या वो उसे अपनाएगी? क्या वो उसे छुएगी? वो सोचकर उलटी करने लगती थी।

अंजलि सोचती — क्या वो कभी प्यार कर पाएगी? क्या कोई उसे पसंद करेगा? क्या वो कभी माँ बन पाएगी? उसके अंदर वो आदमी रहते थे, जो उसे छूते थे, और वो नफरत करती थी खुद से। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।


भाग 5: चाचा का आगमन

अप्रैल का महीना था। गर्मी बढ़ रही थी। तीनों की दिनचर्या चल रही थी।

एक शाम जब वो तैयार हो रहे थे, तो दरवाज़े की घंटी बजी। सुनीता ने दरवाज़ा खोला — और वो जम गई।

बाहर खड़े थे उसके देवर, रमेश — पति का छोटा भाई। 45 साल के, दूसरे शहर में रहते थे, कभी-कभी आते थे।

“भाभी!” रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा। “कैसी हो?”

सुनीता का दिल थम्प से धड़का। वो तैयार थी — साड़ी, सिंदूर, बिंदी, और वो सब जो वो “काम” के लिए लगाती थी।

“रमेश… तुम… तुम यहाँ?”

“अरे हाँ, काम से आया था शहर में। सोचा भाभी से मिल लूँ। राहुल कहाँ है? प्रिया? अंजलि?”

वो अंदर आने लगा। सुनीता ने रोकने की कोशिश की, लेकिन वो आ गया।

अंदर प्रिया और अंजलि खड़ी थीं — दोनों तैयार, दोनों सजी-धजी, दोनों उस रूप में जो वो रात को दिखती थीं।

रमेश ने तीनों को देखा। उसकी समझ में नहीं आया पहले। फिर उसने देखा — सुनीता की साड़ी (ज़्यादा चमकीली), प्रिया की आँखें (काली सुरमा), अंजलि का चेहरा (सफेद, डरा हुआ)।

“ये… ये क्या…?” रमेश ने पूछा।

खामोशी।

फिर रमेश समझ गया। उसने शहर में सुना था — उसकी भाभी और भतीजियाँ क्या कर रही हैं। लेकिन उसने माना नहीं था। अब वो सामने था।

“तुम तीनों… तुम तीनों…” उसका हाथ काँप रहा था।

“चाचा, हम…” प्रिया ने कहना चाहा।

“चुप!” रमेश ने चीखा। “शर्म नहीं आती? मेरे भाई की मृत्यु को दो साल भी नहीं हुए और तुम… तुम…”

उसने सुनीता की ओर उंगली उठाई। “तुम! तुमने मेरे भाई की बेटियों को क्या बना दिया? रंडी? वेश्या?”

सुनीता रोने लगी। वो फर्श पर बैठ गई। “मजबूरी थी देवरजी… मजबूरी…”

“कौन सी मजबूरी?” रमेश गुस्से में चिल्लाया। “मैंने तुम्हें पैसे नहीं दिए? मैंने मना किया था?”

“तुमने मना किया था,” सुनीता ने रोते हुए कहा। “पिछले साल जब माँ बीमार थी, तुमने 5000 दिए थे और कहा था — और माँगना मत।”

रमेश रुका। उसे याद आया — हाँ, उसने कहा था। उसकी पत्नी ने मना किया था — “उनका घर-बार संभालना है, हमारा नहीं।”

“वो… वो अलग बात है,” रमेश ने कहा। “लेकिन ये… ये क्या है? अपनी इज़्ज़त बेचना? अपनी बेटियों की इज़्ज़त?”

“इज़्ज़त से पेट नहीं भरता देवरजी,” प्रिया ने कहा। उसकी आवाज़ कड़क थी, लेकिन आँसू थे। “तुम्हें क्या पता हम क्या सह रहे हैं? तुम आते हो, जाते हो। हम यहाँ रोज़ मरते हैं।”

“तो मरो!” रमेश ने कहा। “लेकिन ये… ये घिनौना काम…”

“घिनौना है,” अंजलि ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ सूखी थी। “बहुत घिनौना है। लेकिन हम कर रहे हैं। क्योंकि कोई और रास्ता नहीं था।”

रमेश ने तीनों को देखा। उसके गुस्से में अब थोड़ी हिचकिचाहट थी। वो सोच रहा था — क्या ये सच है? क्या उसकी भाभी…?

“मैं… मैं किसी को बता दूँगा,” उसने धमकी दी। “समाज को बता दूँगा।”

“बता दो,” सुनीता ने कहा। “फिर हम तीनों सड़क पर आ जाएँगी। फिर तुम्हारी इज़्ज़त भी जाएगी — भाई की विधवा रंडी बन गई।”

रमेश चुप हो गया। वो सोच रहा था — अपनी इज़्ज़त, अपने बच्चों की शादी, अपना नाम।

“मैं… मैं तुम्हें पैसे देता,” उसने कहा। “मैंने कहा था…”

“कितने?” प्रिया ने पूछा। “5,000? 10,000? किराया 15,000 है। फीस 8,000। राशन 5,000। दवाइयाँ 3,000। हर महीने। कितने दोगे?”

रमेश के पास जवाब नहीं था। वो 2,000-3,000 दे सकता था, लेकिन इतने नहीं।

“तो फिर चले जाओ,” सुनीता ने कहा। “जैसे आए थे। और जो देखा है, वो भूल जाओ। या फिर बता दो सबको। हम तैयार हैं।”

रमेश खड़ा था। उसके मन में लड़ाई चल रही थी — गुस्सा, शर्म, डर, और कुछ और… कुछ जो वो स्वीकार नहीं करना चाहता था।

उसने तीनों को देखा — सुनीता, 47 साल, फिर भी आकर्षक; प्रिया, 25 साल, जवान, सुंदर; अंजलि, 21 साल, मासूम, कमजोर।

उसके मन में एक ख्याल आया — जो उसे खुद से नफरत दिलाएगा। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

“मैं… मैं चलता हूँ,” उसने कहा।

वो मुड़ा और दरवाज़े की ओर बढ़ा। लेकिन रुका। उसने पीछे मुड़कर देखा।

“अगर… अगर मैं पैसे दूँ… तो क्या…”

उसने कहना चाहा, लेकिन रुक गया। सुनीता समझ गई। उसका दिल टूट गया — उसका देवर, उसके पति का भाई, उसके बच्चों का चाचा…

“निकल जाओ यहाँ से,” उसने फुसफुसाते हुए कहा।

रमेश चला गया। दरवाज़ा बंद हुआ। तीनों औरतें एक-दूसरे को देखती रहीं।


भाग 6: टूटे हुए रिश्ते

रमेश के जाने के बाद तीनों चुप रहीं। कोई कुछ नहीं बोल रहा था।

आखिरकार सुनीता बोली — “मुझे माफ़ करना बेटियों। मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद कर दी।”

“अम्मा, मत कहो ये,” प्रिया ने कहा।

“सच है,” सुनीता ने कहा। “मैं एक माँ हूँ। मैंने तुम्हें यहाँ तक पहुँचाया। तुम्हारे चाचा ने… उसने जो देखा, जो सोचा…”

वो रोने लगी। “अब वो भी… वो भी…”

“वो कुछ नहीं करेगा,” अंजलि ने कहा। “उसे अपनी इज़्ज़त की पड़ी है।”

“लेकिन वो सोचेगा,” सुनीता ने कहा। “हमेशा सोचेगा। और कभी-कभी… कभी-कभी वो भी आ सकता है।”

प्रिया और अंजलि ने उसे देखा। “क्या मतलब?”

“मर्द,” सुनीता ने कहा। “जब औरत को इस नज़रिए से देख ले, तो वो… वो कभी-कभी…”

वो कह नहीं पाई। लेकिन बेटियाँ समझ गईं।

“नहीं आएगा,” प्रिया ने कहा। “उसकी हिम्मत नहीं होगी।”

“हिम्मत होती है,” सुनीता ने कहा। “जब औरत बिकती हुई दिखती है, तो हर मर्द की हिम्मत बढ़ जाती है।”

तीनों चुप हो गईं। उन्हें पता था कि ये सच था। उन्होंने देखा था — अच्छे आदमियों को बुरे बनते, बुरों को और बुरे।


अगले दिन रमेश का फोन आया। सुनीता ने उठाया।

“भाभी, मैं… मैं माफ़ी माँगना चाहता हूँ,” उसने कहा। “जो मैंने कहा…”

“छोड़ो,” सुनीता ने कहा। “कुछ मत कहो।”

“नहीं, मुझे कहना है,” रमेश ने कहा। “मैंने सोचा… मैं हर महीने कुछ पैसे भेजूँगा। 5,000। जितना हो सकेगा।”

सुनीता रुकी। “क्यों?”

“ताकि… ताकि तुम ये काम छोड़ सको।”

“और अगर नहीं छोड़ सके तो?”

रमेश चुप रहा। “तो… तो मैं समझूँगा। लेकिन कोशिश करो।”

“ठीक है,” सुनीता ने कहा।

फोन कट गया। सुनीता ने बेटियों को बताया।

“5,000 बहुत कम हैं,” प्रिया ने कहा। “लेकिन शुरुआत है।”

“हाँ,” सुनीता ने कहा। “लेकिन वो… वो फिर भी आ सकता है।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसने हमें देखा है,” सुनीता ने कहा। “उसे पता है कि हम क्या हैं। और जब मर्द को पता होता है, तो वो…”

वो रुक गई। लेकिन बेटियाँ समझ चुकी थीं।


दो हफ्ते बाद रमेश आया। पैसे लेकर — 5,000। लेकिन वो अकेला था, और उसकी नज़रें अलग थीं।

सुनीता ने दरवाज़ा खोला। वो तैयार थी — काम पर जाने के लिए। रमेश ने उसे देखा और रुक गया।

“भाभी, तुम… तुम अभी भी…”

“हाँ,” सुनीता ने कहा। “5,000 से किराया नहीं भरेगा।”

“लेकिन मैंने तो…”

“मालूम है,” सुनीता ने कहा। “आओ अंदर।”

रमेश अंदर आया। प्रिया और अंजलि नहीं थीं — वो पहले ही निकल चुकी थीं।

सुनीता और रमेश अकेले थे। रमेश ने पैसे दिए।

“भाभी, मैं… मैं एक बात कहना चाहता हूँ,” उसने कहा। ये कहानी सुनीता भाभी ने रंडी बनकर धंधा चलाया है ।

“मत कहो,” सुनीता ने कहा।

“नहीं, मुझे कहना है,” रमेश ने कहा। “वो रात… जब मैंने तुम्हें देखा… तैयार… मैंने सोचा…”

उसने हाथ बढ़ाया। सुनीता ने पीछे हटी।

“रमेश, मैं तुम्हारी भाभी हूँ।”

“मालूम है,” रमेश ने कहा। “लेकिन तुम… तुम अब वो नहीं रहीं। तुम अब…”

“रंडी हूँ?” सुनीता ने कहा।

रमेश ने हामी भरी। “हाँ। और मैं… मैं भी मर्द हूँ।”

सुनीता ने उसे थप्पड़ मारा। ज़ोर से।

“निकल जाओ,” उसने कहा।

रमेश शर्मिंदा होकर निकल गया। लेकिन वो वापस आया — अगले हफ्ते, और अगले हफ्ते। हर बार वो कुछ और कहने की कोशिश करता, हर बार सुनीता मना करती।

लेकिन एक दिन — जब बहुत ज़रूरत थी, जब कर्ज़दार दरवाज़े पर खड़े थे, जब प्रिया बीमार थी — सुनीता ने हामी भर दी।

नहीं, उसने रमेश के साथ नहीं सोया। लेकिन उसने उससे 10,000 उधार लिए, और वो जानती थी कि ये कभी वापस नहीं कर पाएगी।

और रमेश भी जानता था।


भाग 7: अंत — जीवन जैसा

छह महीने बीत गए। राहुल वापस आया — बीमार, कमजोर, लेकिन जिंदा। उसने पता नहीं कहाँ काम किया था, लेकिन वो वापस आया था।

उसने देखा — घर चल रहा था, अंजलि की फीस भरी थी, खाना मिल रहा था। उसने पूछा — “कहाँ से आए पैसे?”

सुनीता ने कहा — “मैंने कर्ज़ लिया है।”

राहुल ने मान लिया। लेकिन वो देखता — माँ की थकान, बहनों की खामोशी, रात को निकलना, सुबह को लौटना।

उसे शक हुआ। एक रात उसने पीछा किया। और वो देखा — वो होटल, वो गली, वो कमरे।

वो टूट गया। घर आकर उसने पूछा — “क्या कर रही हो तुम तीनों?”

खामोशी।

“क्यों?” राहुल ने रोते हुए पूछा।

“तुम्हारे लिए,” सुनीता ने कहा। “तुम्हारी बहनों के लिए।”

“मैं… मैं मर जाना चाहता था,” राहुल ने कहा। “लेकिन अब… अब मैं कैसे जीऊँगा?”

“जीना होगा,” प्रिया ने कहा। “हमने जीना सीख लिया है। तुम भी सीख लो।”

राहुल ने उन्हें देखा — उसकी माँ, उसकी बहनें। वो समझ गया कि ये ज़िंदगी क्या थी।

“मैं काम करूँगा,” उसने कहा। “कोई भी काम। लेकिन तुम तीनों… तुम बंद करो ये।”

“और कर्ज़?” अंजलि ने पूछा।

“मैं चुकाऊँगा,” राहुल ने कहा। “जिंदगी भर लगे, लेकिन चुकाऊँगा।”

तीनों ने उसे देखा। क्या ये संभव था? क्या वो वापस आ सकती थीं?


आज, दो साल बाद, सुनीता, प्रिया और अंजलि उसी घर में रहती हैं। राहुल ने एक फैक्ट्री में नौकरी पाई — 12,000 रुपये महीना। कर्ज़ अभी भी है, लेकिन थोड़ा कम हो गया है।

तीनों औरतें अब वो काम नहीं करतीं। लेकिन वो पहले जैसी भी नहीं हैं।

सुनीता के बाल सफेद हो गए हैं। वो अक्सर रोती है — खुद के लिए, बेटियों के लिए। प्रिया की शादी नहीं हुई है, और शायद नहीं होगी। वो घर में ही रहती है, कभी-कभी सिलाई का काम करती है। अंजलि ने पढ़ाई पूरी की, लेकिन नौकरी नहीं मिली। वो एक स्कूल में ट्यूशन पढ़ाती है — 3,000 रुपये महीना।

रमेश अब नहीं आता। उसने रिश्ता तोड़ लिया है — “भाभी ने मुझे गलत समझा,” ये कहकर।

लेकिन तीनों जानती हैं कि वो क्या था।

रात को जब वो सोती हैं, तो अभी भी वो आदमी याद आते हैं। अभी भी वो दर्द याद आता है। अभी भी वो शर्म याद आती है।

लेकिन वो जी रही हैं। क्योंकि जीना ही एकमात्र विकल्प था।

अगर तुम्हें कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया टिप्पणी करें

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